जाने अनजाने में हम कुछ ऐसी गलतियां कर देते हैं जिसका पछतावा हमें फिर बाद में होता है और फिर जब हमें उस गलती का पता चलता है तो बहुत देर हो जाती है और तब तक हम बर्बाद हो चुके होते हैं।तो आखिर वह कौन कौन सी गलतियां है जो हमें पता नहीं हैं और जो हमें बर्बाद कर रही है? तो आज इस कहानी में मैं आपको बताता हूं कि इंसान की कौन कौन सी ऐसी गलतियां है जो इंसान को बर्बाद कर देती है। यदि हमारे बर्बादी के कारण पता चल जाए तो हम अपने जीवन को सुखमय जीवन बना सकते है। लेकिन दोस्तों आप इस कहानी में खो जाए इससे पहले चैनल को सब्सक्राइब जरूर कर लेना। तो चलिए कहानी शुरू करते है। बहुत समय पहले की बात है एक शहर में एक धनी व्यक्ति रहा करता था और उस सेठ के पास सभी प्रकार की सुख सुविधाएँ थी। लेकिन उसकी कोई संतान नहीं थी और संतान के दुख में वह हमेशा चिंतित रहता था। फिर एक दिन उसे पता चलता है कि उसकी पत्नी गर्भवती है। फिर वह बहुत ही प्रसन्न हुआ। फिर उसने अपनी पत्नी का बहुत ही अच्छी तरह से ख्याल रखा। फिर ऐसे में एक दिन उसके घर पर एक पुत्र का जन्म हुआ और सेठ पुत्र के जन्म पर बहुत ही प्रसन्न था और उसने पूरे शहर में मिठाई बंटवाई और उसके लालन पालन में कोई भी कमियां नहीं छोड़ी। फिर देखते ही देखते उसका पुत्र बड़ा हो गया। फिर सेठ ने अपने पुत्र को गुरुकुल भेजने का निर्णय किया ताकि वह पढ़ लिखकर एक विद्वान बन सके। लेकिन अभी उसके पुत्र की उम्र ज्यादा नहीं हुई थी। लेकिन उसकी छोटी सी उम्र में अपने बेटे को शिक्षा ग्रहण करने के लिए गुरुकुल भेज दिया था। गुरुकुल में वह बालक अच्छे से शिक्षा को ग्रहण करता और अपने गुरु की सभी आज्ञाओं का पालन भी करता और ऐसे में वह बालक धीरे धीरे वहां का सबसे होनहार बालक बन गया। गुरुकुल में उस बालक ने सारे वेद, पुराण और शास्त्रों का अध्ययन किया और फिर बहुत बड़ा विद्वान बन गया। उसके गुरु भी उस बालक से बहुत ही प्रसन्न थे क्योंकि उसने छोटी सी उम्र में सारा ज्ञान अर्जित कर लिया था। लेकिन वह कहते हैं ना कि समय कब बदल जाए किसी को भी पता नहीं होता और ऐसे ही एक दिन प्राकृतिक आपदा की वजह से उस बालक के माता पिता की मृत्यु हो गई और जब उस बालक के माता पिता की मृत्यु हुई तब तक उसकी शिक्षा पूर्ण नहीं हुई थी। और जब उस बालक ने सुना कि अब उसके माता पिता इस दुनिया में नहीं रहे और उनका सबकुछ बर्बाद हो चुका है तो फिर इस बालक का सांसारिक मोह माया से मन उठ गया। उसके बाद वह बालक ने निश्चय किया कि वह गुरुकुल से शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपना संपूर्ण जीवन लोगों की भलाई में व्यतीत करेगा और जब उस बालक की शिक्षा पूर्ण हो गई तो वह बालक एक संन्यासी बन गया और सांसारिक वस्तुओं से दूर हिमालय के जंगलों में चला गया।
फिर जंगल में जाकर उस बालक ने लंबे समय तक तपस्या की और तपस्या पूर्ण होने के बाद उस संन्यासी ने लोगों को शिक्षा देना आरंभ कर दिया। समय के साथ साथ उस संन्यासी की चर्चा चारों तरफ होने लगी और दूर दूर से लोग उस संन्यासी के पास शिक्षा ग्रहण करने आने लगे और बहुत से लोग उस संन्यासी के पास अपनी समस्या का समाधान खोजने के लिए आने लगे। फिर वह संन्यासी सभी लोगों की समस्याएं बड़ी आसानी से सुलझा देता और इसी वजह से वो पूरे राज्य में मशहूर भी हो गया था। लेकिन जिस नगर में वह रहता था उस नगर का राजा कुरूप व्यक्ति था और जब राजा को उस संन्यासी के बारे में पता चला तो उस राजा ने उस संन्यासी से मिलने का निश्चय किया। फिर अगली सुबह वह राजा अपने महल से निकलकर उस संन्यासी से मिलने के लिए निकल गया। फिर वह उस कुटिया के पास जाकर पहुंच गया और वहां पर पहुंचकर जब उस राजा ने उस संन्यासी को देखा तो वह देखता ही रह गया, क्योंकि उस संन्यासी के चेहरे पर एक अलग ही तेज था और जब वह संन्यासी के पास पहुंचा तो राजा को एक अपार शक्ति का अनुभव हुआ। फिर उस राजा ने संन्यासी को प्रणाम किया और उसी के पास बैठ गया। फिर उनसे वार्तालाप करने लगा। वह राजा पहले ही मुलाकात में उस संन्यासी के व्यक्तित्व से इतना ही प्रभावित हुआ कि उस राजा ने उसी समय से अच्छाई पर चलने का निश्चय कर लिया और मन ही मन सोचने लगा कि इतनी छोटी सी मुलाकात में यह संन्यासी मुझे इतना बदल सकता है। तो अगर यह हमेशा मेरे साथ ही रहने लगे तो मेरी तो जिंदगी ही बदल जाएगी। और यही सोचकर राजा संन्यासी से अपने महल चलने का आग्रह करने लगा। राजा का आग्रह सुनकर वह संन्यासी मना नहीं कर पाया। फिर वह राजमहल चलने के लिए तैयार हो गए। फिर वो राजा उस सन्यासी को लेकर राजमहल की तरफ चल दिया। फिर राजमहल को पहुँचकर उस राजा ने सन्यासी का खूब आदर और सत्कार किया। फिर उसके बाद राजा ने उस सन्यासी को एक शाही कमरे में भोजन करवाया। फिर भोजन करने के बाद उस सन्यासी ने राजा को धन्यवाद किया और राजा से जाने की आज्ञा भी मांगी। और यह सुनकर राजा ने उस सन्यासी से कहा कि आप जब तक चाहे तब तक आप हमारे बगीचे में घूम सकते हैं और रह सकते हैं और आपको यहाँ पर किसी भी प्रकार की असुविधा नहीं होगी और आप यहाँ पर रहेंगे तो हमारी प्रजा को भी अच्छा लगेगा। और यह सुनकर उस संन्यासी ने राजा का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। फिर उसके बाद राजा ने अपने सेवकों से कहा कि सन्यासी महाराज का, बगीचे में रहने का, खाने का और वस्त्र आदि का प्रबंध किया जाए। फिर राजा के आदेश के बाद सेवकों ने उस बगीचे में सुंदर कुटिया का निर्माण कर दिया। फिर उसके बाद वह सन्यासी उसी कुटिया के अन्दर रहने लगे।
फिर सन्यासी को उस कुटिया में रहते रहते कई सालों बीत गए और उस दौरान राजा ने उस सन्यासी की खूब सेवा की। परंतु कई सालों के बाद राजा और रानी को एक आवश्यक कार्य के लिए दूसरे राज्य जाना पड़ा। लेकिन उसने एक सेवादार को उस संन्यासी की सेवा के लिए नियुक्त कर दिया था। परंतु वह सेवादार राजा के जाने के बाद वह बीमार पड़ गई और अपने घर चला गया और कभी वापस लौटकर नहीं आया तो संन्यासी ने क्रोध में आकर उस राजा को खूब सुनाया और राजन से कहा कि हे राजन! जो जिम्मेदारी तुम पूर्ण नहीं कर सकते तो वह उठाते ही क्यों हो? तब राजा ने उस संन्यासी से क्षमा मांगते हुए कहा, यदि मुझसे कोई भूल हो गई हो तो मैं उसके लिए आपसे समय मांगता हूं। कृपया करके आप मुझे क्षमा कर दीजिए और आप अपना क्रोध भी शांत कर दीजिए और मुझे बताइए कि आखिर हुआ क्या है? फिर यह सुनकर उस संन्यासी ने कहा कि तुम्हारे जाने के बाद मुझे यहां पर किसी ने भी भोजन नहीं दिया और मैं बहुत दिनों तक भूखा ही रहा और मुझे यहां पर किसी ने आकर पूछा तक नहीं कि मैं किस हाल में हूं। और यह सुनकर राजा ने संन्यासी से क्षमा मांगी और कहा कि हे भगवन! आज के बाद में ऐसी कोई भी गलती नहीं होगी। फिर कुछ देर बाद सारा मामला शांत हो गया। जब राजा और उस संन्यासी के बीच वार्तालाप हो रही थी तो राजा की रानी भी सारी वार्तालाप चुपके से सुन रही थी और सबकुछ देख भी रही थी। उसके बाद राजा ने उस संन्यासी को एक भी शिकायत का मौका नहीं दिया और उसकी खूब सेवा की। परंतु कुछ दिनों के बाद राजा को फिर किसी आवश्यक कार्य के लिए अपने राज्य से बाहर जाना पड़ा। लेकिन इस बार राजा ने राज्य से बाहर जाने से पहले अपनी रानी से कहा कि जब तक में नहीं आऊं तब तक आप स्वयं संन्यासी की सेवा करेंगी। और यह सुनकर रानी ने कहा कि जी महाराज आप निश्चिंत होकर जाइए। मैं संन्यासी महाराज की अच्छे से देखभाल करूंगी। उसके बाद रानी हर दिन भोजन बनाकर। संन्यासी महाराज को भेज देती थी। लेकिन एक दिन रानी नहाने के लिए चली गई और संयासी को भोजन देना भूल गई। संन्यासी ने काफी देर तक भोजन का इंतजार किया, लेकिन जब भोजन नहीं आया तो संन्यासी सोच में पड़ गया कि आज खाना क्यों नहीं आया। उसके बाद संन्यासी ने सोचा कि वह खुद महल में जाकर देखेगा कि अभी तक खाना क्यों नहीं आया। और फिर वह महल पर पहुंच गया और जब वह महल के अंदर पहुंचा तो वहां उसकी नजर रानी पर पड़ी। रानी के लंबे लंबे घने काले केश जोकि उसकी कमर पर लहरा रहे थे और उसकी कजरारी आंखें जो देखने मात्र से ही घायल कर दे और उसकी हिरनी जैसी चाल। रानी की इतनी सुंदरता देखकर वह संन्यासी चकित हो गया। और रानी की सुंदरता संन्यासी के मन में घर कर गई और वह वहां पर बिना कुछ कहे ही अपनी कुटिया पर वापस लौट आया। संन्यासी रानी की सुंदरता को भुला न सका और वह खाना पीना छोड़कर अपनी ही कुटिया में पड़ा रहा।
उसने कई दिनों से कुछ भी नहीं खाया और इस वजह से वह बहुत कमजोर हो गया और कुछ दिनों के बाद राजा वापस लौटे और उसे संन्यास की हालत का पता चला तो वह सीधे संन्यासी के
पास पहुंच गई और बोले कि हे भगवन! क्या बात है? आपको क्या हो गया और आप इतने कमजोर क्यों हो गए? आखिर आपको किस बात की चिंता है और आप किस गहरी सोच में डूबे हो? क्या मुझसे कोई भूल हो गई? और तभी संन्यासी ने कहा कि नहीं राजन, आपसे कोई भूल नहीं हुई है और यह सुनकर राजा ने कहा, तो आखिर बात क्या है? कृपया करके आप मुझे बताइए। मैं आपकी परेशानी अवश्य दूर करूंगा। और यह सुनकर संन्यासी ने राजा से कहा कि हे राजन! मैं आपकी रानी की अद्भुत सुंदरता को देख कर उनकी सुंदरता की सोच में पड़ गया हूं और मैं रानी के बिना जिंदा भी नहीं रह सकता। और यह सुनकर राजा हैरान हो गया और
कुछ देर सोचने के बाद राजा ने उस संन्यासी से कहा कि मैं आपको रानी दे दूंगा और यह सुनकर संन्यासी बहुत ही ज्यादा प्रसन्न हो गया। फिर वह राजा उस संन्यासी को लेकर महल चली गई और जब वह राजा और संन्यासी महल पर पहुंचे तब उस रानी ने अपने सबसे सुंदर वस्त्र और सबसे सुंदर गहने पहने थे। फिर राजा अपनी रानी के पास पहुंचे और रानी से कहा कि आपको इस संन्यासी की मदद करनी चाहिए। यह बहुत कमजोर पड़ गई है और मैं नहीं चाहता कि किसी ज्ञानी पुरुष की हत्या का कलंक मेरे सर पर लगे। उसके बाद राजा ने रानी से पूछा कि क्या यह पाप आप अपने सर पर लेना चाहती है?
राजा की यह बात सुनकर रानी ने राजा से पूछा कि आखिर इस संन्यासी के दुख का कारण क्या है? तो फिर राजा ने रानी से कहा कि यह संन्यासी आपकी सुंदरता के अद्भुत दीवाने हो गए हैं। और राजा की यह बात सुनकर रानी ने कहा कि हे राजन कि आप चिंता मत करिए। अब आप सब कुछ मेरे ऊपर छोड़ दीजिए और अब मुझे पता है कि अब मुझे क्या करना है। उसे ना तो आपके ऊपर संयासी की हत्या का पाप लगेगा और न ही उससे मेरे पवित्र धर्म का नाश होगा। रानी की बात सुनकर राजा ने अपनी रानी को संन्यासी को सौंप दिया। उसके बाद संन्यासी रानी को लेकर उस कुटिया पर पहुंचे। जब रानी संन्यासी की कुटिया पर पहुंची तो रानी ने संन्यासी से कहा कि हमें रहने के लिए घर चाहिए। हम इस झोपड़ी में नहीं रह सकते। और यह सुनकर संन्यासी उस राजा के पास गया और राजा को जाकर बोला कि हे राजन, हमें रहने के लिए एक घर चाहिए और संन्यासी की यह बात सुनकर राजा ने एक घर का भी प्रबंध कर दिया। फिर संन्यासी उस रानी को लेकर घर पहुंचा। जब रानी संन्यासी के साथ उस घर पर पहुंची तो रानी ने संन्यासी से कहा कि यह घर तो बहुत गंदा है और इसकी हालत भी बहुत खराब है। मैं इस घर में नहीं रह सकती। और यह सुनकर संन्यासी वापस राजा के पास पहुंचा और राजा के पास जाकर बोला कि हे राजन जो आपने हमें घर दिया है वह घर की हालत बहुत ही खराब है। संन्यासी की यह बात सुनकर राजा ने उस घर की हालत भी ठीक करवा दी। उसके बाद रानी घर के अंदर गई और नहा धोकर बिस्तर पर आ गई। फिर संन्यासी भी बिस्तर पर आ गया। फिर उसके बाद रानी ने संन्यासी से कहा कि आपको पता है कि आप कौन हैं और अब आप क्या बन गए हैं। आप एक महान संन्यासी थे, जिसके लिए राजा स्वयं सारी जरूरत की वस्तुएं उपलब्ध कराते थे। जिसके पास लोग दूर दूर से ज्ञान ग्रहण करने के लिए आते थे और जो लोगों को सत्य की राह दिखाया करते थे और जो लोगों की समस्याओं का समाधान भी करते थे और आप जिस वासना के कारण मेरे गुलाम हो गए हैं। रानी की यह बात सुनकर संन्यासी को एक झटका लगा और उसे महसूस हुआ कि वह तो एक संन्यासी है और वह यह सब क्या कर रहा है? वह तो इन सारी सुख सुविधाओं को छोड़कर जंगलों में चला गया था। फिर जब संन्यासी को सूझ बुझ आई तो वह जोर जोर से रोने लगा और चिल्लाने लगा और रानी से कहने लगा कि मुझे क्षमा कर महारानी, मैं क्या करने जा रहा था। मैं अभी आपको राजा को सौंपकर आता हूं। संन्यासी की यह बात सुनकर रानी ने संन्यासी से प्रश्न किया कि महाराज मेरे मन में एक प्रश्न उठ रहा है। कृपया करके मेरे प्रश्न का उत्तर दीजिए। रानी की यह बात सुनकर संन्यासी ने कहा कि पूछो तुम्हारा क्या प्रश्न है? तब रानी ने पूछा कि जब आपको उस दिन भोजन नहीं मिला तो आप बहुत ही क्रोधित हो गए।
तब मैंने आपका यह रूप पहली बार देखा था और तभी से मैं आपके व्यवहार में परिवर्तन महसूस कर रही हूं। और ऐसा क्यों हुआ महाराज, आखिर आपको इतना क्रोध क्यों आया? रानी की यह बात सुनकर
संन्यासी ने रानी को समझाया कि जब मैं जंगलों में था तब मुझे समय पर भोजन भी नहीं मिलता था। लेकिन जब मैं महल में आया तो महल में आने के बाद मुझे सारी सुख सुविधाएं मिली और फिर मैं इन सभी सुख सुविधाओं के मोह में फंस गया और मुझे इन सभी सुख सुविधाओं के लिए मोह उत्पन्न हो गया और फिर मुझे इन सभी सुख सुविधाओं को पाने का लालच उत्पन हो गया और जब यह मुझे नहीं मिला तो मेरे अंदर क्रोध उत्पन हुआ। फिर संन्यासी ने कहा कि महाराज सच तो यह है कि इच्छा पूरी नहीं हो तो क्रोध उत्पन्न होता है और जब इच्छा पूरी हो जाए तो लालच बढ़ जाता है। फिर संन्यासी ने रानी को कहा कि इच्छा की पूर्ति ही मुझे वासना के द्वार तक लेकर आई है और मैं आपके प्रति
आकर्षित हो गया। इसके बाद संन्यासी ने कहा कि राजन् !
मुझे क्षमा कर दीजिए, क्योंकि मुझे मेरी गलती का एहसास हो गया है। ये लो आपकी रानी, मुझे ये सब नहीं चाहिए। मैं अपनी इच्छा के वशीभूत होकर यह गलत कार्य करने जा रहा था और अपने जीवन को बर्बाद कर रहा था। लेकिन अब मुझे सबकुछ समझ आ गया है। उसके बाद उस संन्यासी ने कहा कि हे राजन! मनुष्य की बर्बादी के कारण उसकी चार आदतें बनती है और दुनिया के हर एक व्यक्ति के अंदर ये चार अवगुण होते हैं। लेकिन जो व्यक्ति इन पर नियंत्रण पा लेता है वह दुख और परेशानियों से बच जाता है और जो व्यक्ति इन चारों दोषों पर नियंत्रण नहीं कर पाता, वह बर्बाद होने के कगार पर पहुंच जाता है। यह सुनकर राजा ने कहा कि महाराज आप मुझे वह चार आदतें बताइए जिससे कि मनुष्य की बर्बादी हो जाती है। फिर संन्यासी ने राजा को मनुष्य को बर्बाद करने वाली चार आदतों के बारे में
बताया कि हे राजन! मनुष्य को बर्बाद करने वाली पहली आदत है इच्छा क्योंकि इच्छा ही दुनिया की हर एक व्यक्ति के अंदर सबसे पहला अवगुण होता है और जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं को नियंत्रण में नहीं रख पाता है वह जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हो पाता है। क्योंकि जैसे ही उसकी एक इच्छा पूरी होती है वह दूसरे की ओर बढ़ने लगता है और दूसरी पूरी होती है तो फिर तीसरी इच्छा उसके मन में जागृत हो जाती है। और फिर ऐसा करते करते इच्छाओं के ऊपर नियंत्रण न होने के कारण वह इसी जाल में उलझा रहता है और दुखी रहता है। इसीलिए राजन् ! जब हम इच्छाओं पर नियंत्रण पा लेते हैं, तब हम हमारे मन पर भी नियंत्रण पा लेते हैं और जब हमारा मन हमारे वश में होता है, तब हमें सच्चे सुख की प्राप्ति होती है। फिर जब हम जो चाहते हैं, वही हमारे साथ होता है। फिर संन्यासी राजा को कहता है कि मनुष्य को बर्बाद करने की दूसरी आदत है वासना। वासना का जन्म हमारे मन में उठने वाली इच्छाओं से होता है, क्योंकि जिस प्रकार इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता और मनुष्य वासनाओं के जाल में फंसता ही चला जाता है। वासनाओं से वशीभूत होकर मनुष्य को कुछ भी नजर नहीं आता है, क्योंकि आज तक जितनी भी लड़ाइयां हुई है, उसका सबसे बड़ा कारण स्त्री को पाने की इच्छा ही रही है। स्त्री के प्रेम में वशीभूत होकर राजा महाराजाओं ने आज से पहले बहुत सारे युद्ध किए हैं। रावण इस संसार का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति था, लेकिन उसने भी माता सीता की सुंदरता के फेर में आकर अपना सब कुछ बर्बाद कर लिया और उसकी मृत्यु का कारण एक स्त्री ही बनी थी और कई राजा महाराजा तो युद्ध में इसलिए हार गए क्योंकि वह लोग स्त्रियों के बीच रासलीला रचाने में ही रह गए। ईश्वर ने स्त्री की उत्पत्ति इस संसार को बढ़ाने के लिए की है लेकिन आजकल लोगों ने इसे अपनी वासना का कारण बना लिया है और अपने मनोरंजन का साधन समझने लगे हैं और जब उन्हें अपना मनोरंजन नहीं मिलता तो वह पागल हो जाते हैं और न जाने क्या क्या कर बैठते हैं। इसीलिए हे राजन, जितना हो सके वासना से दूर रहना चाहिए। फिर संन्यासी राजा से कहता
है कि हे राजन! मनुष्य को बर्बाद करने का तीसरा कारण है क्रोध। क्योंकि जब मनुष्य की वासना की पूर्ति नहीं होती है तो उसके अंदर क्रोध उत्पन्न हो जाता है और जब व्यक्ति को क्रोध आता है तब उसका क्रोध पर नियंत्रण नहीं होता है और फिर वह क्रोध में आकर कई सारे गलत निर्णय ले लेता है। वह दूसरों को भला बुरा कह देता है और जब उसका क्रोध शांत हो जाता है तब उसे उसकी गलतियों का एहसास होता है।
लेकिन तब तक तो सब कुछ बर्बाद हो चुका होता है। क्रोध के कारण मनुष्य के कई बनाए काम भी बिगड़ जाते हैं। जब मनुष्य के भीतर क्रोध उत्पन्न होता है तो वह अंदर से बहुत कमजोर हो जाता है और एक कमजोर इंसान कुछ भी नहीं कर सकता है। उसे कभी भी सफलता हासिल नहीं हो सकती और क्रोध हमारे भीतर तनाव को उत्पन्न करता है। और अगर एक बार हम तनाव में चले गए तब हमारा पूरा जीवन बर्बाद हो जाता है। फिर संन्यासी राजा को कहता है कि हे राजन! मनुष्य को बर्बाद करने की चौथी आदत है लालच। हे राजन! लालच का फल हमेशा बुरा होता है और लालच में पड़कर हम कई सारे लोगों का बुरा भी कर देते हैं। हर मनुष्य के जीवन में कभी न कभी ऐसे अवसर जरूर आते हैं, जब वह लालच कर बैठता है और अधिक पाने की लालसा में वह ऐसा कुछ कर बैठता है जिससे जो उसके पास था वह उसे भी गवा देता है। क्योंकि जैसे ही व्यक्ति की एक इच्छा पूरी होती है तो उसका लालच तुरंत बढ़ जाता है और उसके मन में और कई आकांक्षाएं जन्म ले लेती है। जो व्यक्ति लालच करता है
वह कामयाबी से कोसों दूर रहता
है क्योंकि एक न एक दिन लालच का दुष्परिणाम सामने आता ही है और अगर हम समय रहते ही लालच को। जाति और उसके फेर में न पड़ें तो हम एक सफल व्यक्ति अवश्य बन सकते हैं। फिर अंत में संन्यासी राजा से कहता है कि हे राजन! अगर मनुष्य इन चारों आदतों को छोड़ देता है तो उसे जीवन में सफल होने से कोई नहीं रोक सकता और जो इन आदतों को नहीं छोड़ता है, उसे जीवन में बर्बाद होने से कोई नहीं रोक सकता। मैं एक संन्यासी होकर इस फेर में पड़ गया था तो सामान्य मनुष्य तो इससे बच नहीं सकता। इसीलिए हे राजन! मनुष्य को आदतों से हमेशा बचना चाहिए। तो दोस्तो, कैसी लगी कहानी आपको कमेंट सेक्शन में जरूर बताना और अगर इस चैनल पर नए हो तो चैनल को सब्सक्राइब जरूर कर देना। तो मिलते है ऐसी एक नई कहानी में।
